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Friday, 5 August, 2005

हकीकत को हिकारत से देखिए

मेरे सामने अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के एक समारोह का निमंत्रण पत्र रखा है। सोचता हूं जब बुलाया गया है तो कुछ न कुछ बोलना ही पड़ेगा। किसी को जिस तरह छपास रोग लग जाता है तो छूटने का नाम नहीं लेता है उसी तरह मुझे सभा समारोहों में माइक से चिपके रहने की आदत सी हो गयी है। क्या बोलता हूँ कैसे बोलता हूँ या सुनने वाले कितना बोर हो रहे है, उस वक्त मुझे इन सबसे कोई मतलब नहीं होता है। माइक छोड़ने को जी नहीं चाहता है जब तक कि दो-चार बार संचालक की चिट न सामने रख दी जाए।
हाँ, तो मैं महिला दिवस के उस समारोह की बात कर रहा था। दो चार मित्रों से पाई उल्टी-सीधी पत्रिकाओं और अखबारो के ताजे-बासी विशेषांकों के पन्ने पलटते हुए मैटर कलेक्ट करने के चक्कर में जूझा जा रहा हूं। तभी याद आता है कि इस बार तो महान चमत्कार हो गया है। महाशिवरात्रि और अर्न्तराष्ट्रीय महिला दिवस एक ही दिन पड़ रहे हैं। शिव शक्ति और महिला सशक्तिकरण का दिन। अभी कुछ देर पहले आधा दर्जन बच्चों की सशक्त मां ने छोटू से कहलाया है कि अपने पापा से कह देना कि मम्मी कल के शिवरात्रि के व्रत के लिए सामान खरीदने शुक्लाइन आण्टी के साथ बाजार गयी हैं। तभी मुझे याद आया कि कल तो शक्ति स्वरूपा धर्मपत्नी जी पाक शाला मे अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से रहीं। मुझे ही भोजन बनाने से लेकर बर्तन मांजने तक की कसरत करनी पडेगी साथ ही भाषण देने की तैयारी भी। सोचता हूं हे शिवभवानी कुछ ऐसा जादू कर दे कि श्रोता मंत्र-मुग्ध हो उठे और मुझे कल का सर्वोच्च वक्ता ठहराते हुए एक बढ़िया सा स्मृति-चिन्ह भेंट कर दें। अभी अखबारों को उलटते पलटते एक समाचार पर नज़र रूक जाती है। एक कोने में छोटा सा छपा समाचार यूं है कि मध्यप्रदेश के किसी गांव में एक दलित महिला को नग्न करके पूरे गांव में घुमाया गया। उस पर आरोप था कि उसने किसी बच्चें पर टोना-टोटका करके मार डाला। अभी मैं उस खबर के बारे में कुछ मनन चिन्तन करने बैठा ही हूं कि हाथ में कोलाज लिए पत्रकारिता का एक छात्र दाखिल होता है। कोलाज दिखाते हुए पूछता है ‘अंकल आज विश्व महिला दिवस पर आयोजित प्रदर्शनी के लिए यह कोलाज ठीक है न?’ कोलाज पर कल्पना चावला, किरन बेदी, उमा भारती, लता मंगेशकर, मदर टेरेसा, सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज और ऐसी कई दिग्गज महिला हस्तियों के चित्र बड़े करीने से किसी न किसी आकर्षक टाईटल के साथ चस्पां किये गये थे। मैनें उससे पूछा कि जब महिलाओं ने इतनी तरक्की कर ही डाली है तो फिर आयोजन का औचित्य क्या है? तुम्हें और मुझे आज के महिला दिवस के लिए हाथ पैर मारने की जरूरत क्या है? आखिर महिला दिवस किन महिलाओं के लिए मनाया जा रहा है? अच्छा यह बताओ कि तुम्हारे कोलाज में उन सांसदों विधायको, अफसरों और मठाधीशों के चित्रांकन क्यों नहीं हैं जो ‘नारी तुम केवल श्रध्दा हो’ के बजाये नारी को दिल बहलाने का सामान समझते हैं? उस नग्न नारी के चित्र को क्यों नहीं स्थान दिया गया जिसे इक्कीसवीं सदी के सभ्य भारत में टोने-टोटके के नाम पर पूरे गांव में बड़ी शान से नग्न घुमाया जाता है? वह छात्र मायूस सा कहता है ऐसे चित्रों को लगाने से मना कर दिया गया है।
‘मना......’ कुछ सोचते-सोचते मैं रूक जाता हूं और उन आयोजकों की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए कहता हूं ‘हाँ-हाँ मना किया गया होगा, ठीक किया गया।’ छात्र कोलाज लिए हुए कमरे से बाहर चला जाता है। मैं सोचता हूं कि अखबार के कोने में छपी खबर अगर कोलाज पर लगाई गयी तो वर्ल्ड में भारत के बारे में क्या मैसेज जाएगा? शायद इसीलिए ‘दी­पा मेहता’ को ‘वाटर’ की शूटिंग करने से मना कर दिया गया था। हकीकत बड़ी कडुवी होती है। हज़म करना बड़ा मुश्किल होता है। आधी दुनिया को बुलन्दी पर पहुँचता दिखाकर हिन्दुस्तान में नारी सशक्तिकरण से विश्व को परिचित भी तो कराना है। उसके लिए सच्चाई को छुपाना बहुत जरूरी है। यही होता रहा है। होता रहेगा। यूं ही विश्व महिला दिवस के आयोजन को दो बूंद जिन्दगी की तरह चलने देना चाहिए। कुछ सीरियलों की तरह लम्बा खिंचना जरूरी है। व्याख्यान मालाओं से भारत माता का मस्तक ऊँचा रखना है। सोचता हूँ मैं महामूर्ख हूं। निगेटिव क्यों सोचता हूँ? हमेशा सच्चाई पर पर्द डालते हुए पॉजटिव सोच बनाना चाहिए। इसी लाइन पर भाषण तैयार करने में लग जाता हूं। मान कर चल रहा हूं कि यद्धपि महिला विधेयक अभी कोसों दूर है फिर भी हमारे यहां महिलाओं की स्थिति एकदम चकाचक है।

कहैं कबीर सुनो भाई साधो...

आये भी वह गये भी खत्म फ़साना हो गया। पार्टी वालों की बल्ले-बल्ले रही। उधर नेता जी ने एक काम जरुर शानदार या बेमिसाल किया कि कबीर बाबा को समाजवादी की सदस्यता दे डाली। अब सुना जा रहा है कि बीनी बीनी रे झीनी चदरिया गा गा कर नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे घुमक्कड़ कबीर बाबा अपने राजनीतीकरण पर काफी परेशान दिख रहें हैं। नेता जी के जाने के बाद बिजली बाई की नौटंकी के उजडे़ स्टेज के पास उनसे अचानक मुलाकात हो गयी। बधाई देने के बाद उनसे प्रतिक्रिया जाननी चाही तो कबीर बाबा ने कहा कि यह तो नेता जी की महानता है जो मेरे जैसे अदना से इंसान की झोली में समाजवादी सदस्यता डाल दी। साहेब मेरी तो छीछालेदर हो रही है। अब देखो न अपने तोगड़िया और कटियार है जो मेरे राम भक्ति पर मुग्ध हो कर मुझे अपने दल की सदस्यता प्रदान कर के इस कबीर को अपने ढ़ंग से राजनीति का मुखौटा पहनाना चाहते है। उधर महामाया जी मुझे मनुवादी विचारधारा का घोर-विरोधी समझ कर अपने पालतू गजराज पर बैठाकर नगर भ्रमण का अवसर देने को उत्सुक है। अब आप का कबीर किधर जाए कुछ समझ में नहीं आ रहा है। असल में बात यह है कि कबीर को किसी ने पहचाना ही नहीं। याद है न जब तक मैं जीवित रहा किसी ने घास नहीं डाली। किसी ने पगला कहा किसी ने दीवाना बताया। किसी ने हिन्दू बताया तो किसी ने पहचाना ही नहीं। मैं तो समाजवाद की एबीसी तक नहीं जानता हूँ क्योंकि मेरे जमाने में यह सब लफड़ा था ही नहीं। बस इतना जानता था कि सब एक राम या ख़ुदा के बंदे हैं बहरहाल यह तो दुनिया की दस्तूर है कि मरने के बाद सब की तारीफ में कसीदे पढ़े जाते है। उसी दिन मगर में बैठे-बैठे पढ़ रहा था कुछ खाकी नेकर सफेद कमीज और काली टोपी वाले इंदिरा जी की जम कर तारीफ कर रहे थे। मगर जब वही तारीफ़ आडवाणी भाई ने मरहूम जिन्ना साहब के लिये किया तो यही लोग उन्हे बुरा भला कहने से नही चूके। कबीर बाबा को मै बड़े ध्यान से सुन रहा था। कबीर अचानक हंसे और कहने लगे कि यहां तो ‘एडवान्स बर्थ डे’ मनाने का चलन हो गया है उसी तरह जैसे मरने के पहले लोग बाग अपनी समाधि बनवाने लगे हैं, कब्र खुदवाने लगते है और अपनी मूर्ति लगवा कर एडवान्स में अपनी तमन्नायें पूरी कर लेते हैं।
खैर जो कुछ भी हुआ या हो रहा है सब ठीक है। अपना-अपना स्वास्थ है। कल भी कबीर को मानने वालों ने अपने को दास हैं। नेता जी के आने के पूर्व भी ये बेचारे दास गर्मी में झुलस रहे थे।
अंधेरे में खंजड़ी बजा-बजा कर दिल बहला रहे थे और उनके चले जाने के बाद भी शायद फिर उसी अंधेरे में रामनाम लेते हुए जीने की कोशिश करेंगे। अरे यह भी कोई समाजवाद है कि उनके आने पर बिजुरिया ससुरी खूब लंहगा फटकार-फटकार कर कबीर के निर्गुन पर डांस कर रही थी और उनके जाने के बाद सब टांय-टांय फिस्स। कबीर को खुश किया तो क्या किया अरे सब को खुश करने का जतन किया होता तो कबीर को समाजवाद की बात समझ में आती। अरे कबीर तो पहले भी बुतपरस्ती और दिखावे के खिलाफ़ रहा, आज भी हैं। क्योंकि वह देख चुका है कि लेनिन, सद्दाम, गाँधी, दीनदयाल उपाध्याय और अम्बेडकर की मूर्तियों का क्या अंजाम हो रहा है। उसे तो डर है कि कहीं उसके निर्गुन को लोग कल नकार न दें। अब अगर मौजूदा वक्त में कबीर के नाम से उनके वोंटों की झोली भर जाए तो बेचारा कबीर कर ही क्या सकता है क्योंकि आज उसका वजूद है कहां? वोटों की झोली और मांगी मुराद पूरी हो जाने के बाद कौन किसको पूछता है? रही बिजुरिया की बात तो वह भी बेचारी करे तो क्या करे? दास आखिर दास है।

हमने मीडिया प्रभारी बनना सीख लिया

वैसे जनाब इतना समझ लीजिए कि जो नुस्खा यहां बतलाने के लिए कलम घिसी जा रही है वह मरहूम हकीम लुकमान और भाई लक्ष्मण की चंगा करने वाले सुषेण वैध के पास भी नहीं था। काबिलीयत में उनके दस ग्राम की भी कमी नहीं थी लेकिन उनके जमाने में ऐसी बीमारी थी ही नहीं। इस जमाने के यह बीमारी इतनी सुखद हो गयी है कि हर कोई इसमें मुफ्तिला होने के लिए अथवा सब कुछ कुर्बान करने को तैयार बैठा है।
बीमारी का नाम है मीडिया प्रभारी का ठण्डा-गरम बुखार। आज कल जब से मीडिया की झाड़ झंखार बेतरतीब ढंग से फैलती जा रही है और अपने कैम्पस में खूबसूरत फूलों की क्यारियों पर क्यारियां फैलती जा रही मीडिया प्रभारी का बुखार लोगों को दबोचता जा रहा है। लोग भी खूब हैं कि ऐसे बुखार से जलते हुए बदन के बावजूद वे चिर परिचित आनन्द का अनुभव कर रहे हैं। गौर तलब है कि मीडिया प्रभारी के बुखार के लिए मीडिया की जानकारी की कोई जरूरत नहीं है। बस जरूरत है कई अदद मीडिया वालों को सुबह शाम गरमा गरम जलेबी का भोग लगाना। जलेबी ही क्यों अगर हो सके तो चाय समोसे को एक अदद मुस्कान के साथ पेश करना। इसके लिए कोई जरूरी नहीं कि भाषा का मौखिक और लिखित ज्ञान का भण्डार हो।
यही सोच लीजिए कि पहले चोबदार हुआ करते थे, भाट और चारण दरबार की शोभा बढ़ाते हुए राजे महराजों की शान में कसीदे पढ़ा करते थे। आज उन्हें मीडिया प्रभारी का अच्छा सा नाम दिया है। वक्त-वक्त की बात है। कल तक जो नौंटकी के फूहड़ जोकर कहलाते थे, आज फिल्मों में कमेडियन का नाम पाकर फख्र महसूस करते हैं। बस चाहे कैम्पस हो या कारखाना मीडिया प्रभारी की अहमियत की नगड़िया बज रही है। सबसे खासियत इस बेवक्त के बुखार में यह हैं कि मीडिया प्रभारी अपने को किसी अकबरे आज़म के राजा मान सिंह से कम नहीं समझता है। आका बाद में पहले मीडिया प्रभारी फिगर में दिखाई देता है।
बेचारा अपने ओरिजिनल काम को भूलकर मीडिया की एक अदद डिबिया में अपने को बंद कर सुखद अनुभव का नजारा करता है। ख्वाब में आए हकीम लुकमान और धन्वन्तरि जी के साथ जब मैंने संयुक्त रूप से चर्चा की तो उन्होंने जोर का झटका धीरे से देते हुए कुछ नुस्खे बताए जिसे सार्वजनिक हितार्थ यहां दिये जा रहे हैं जो शायद कुछ अति उत्साही लोगों के काम आ जाए क्योंकि जमाना मीडिया का है।–
नम्बर एक – अपने बॉस के साथ परछाई की तरह रहना और बॉस की जुब़ान से निकले एक-एक शब्द को रंग रोगन के साथ प्रकाशित करना। हमेशा ब्रेड और बटर साथ रखना निहायत जरूरी है।
नम्बर दो – कैम्पस या कारखाने जिसमें वह तैनात हो उसकी तारीफ में एक वार्षिक या अर्द्धवार्षिक पत्रिका का प्रकाशन कराना, वह भी अंग्रेजी के हाई स्टैण्डर्ड फ्रेम पर। भले वह कैम्पस या कारखाना हिन्दी भाषी क्षेत्र में स्थित हो। क्योंकि जो बात अंग्रेजी में है वह हिन्दी में कहां?
नम्बर तीन – हमेशा ध्यान रहे कि अगर उस कैम्पस या कारखाने में जनसम्पर्क नाम का कोई पालतू जानवर है तो उसे हमेशा बांध कर रखना जिससे वह हावी न होने पाए और बॉस का स्नेह उसे ज्यादा न मिलने पाए। वरना आपका वजूद खतरे में पड़ सकता है।
नम्बर चार – कैम्पस या कारखाने में इत्तिफाक से यदि कोई कलमबाज दिख जाए तो उसे पीटना। फिर खूब पीट कर बाज़ उड़ा देना और कलम को हथिया लेना जिससे बॉस आप के कलम की करामात का कायल हो जाए।
नम्बर पाँच – कोशिश यह करना चाहिए कि एक सफलतम प्रभारी बनने के लिए अपने बाल-बच्चों के नाम से कुछ रचनाएं प्रकाशित कराते रहने का यत्न करना चाहिए जिससे आपके सम्पूर्ण परिवार की रचना धर्मिता का झण्डा लहरा उठे और साबित हो जाए कि आप मीडिया के बहुत खानदानी नीयरेस्ट व डीयरेस्ट हैं।
नम्बर छः – बिना इसका ख्याल किये कि आपका नामचीन कैम्पस या कारखाना किसी पब्लिसिटी का मोहताज है अब भी मौका मिले बिना बॉस की जानकारी के कुछ पोस्टर छपवा कर शहर में बंटवा देना चाहिए। जैसे कि आजकल कुछ कोचिंग वाले बंटवा रहे है।
नम्बर सात – यह ध्यान रखना निहायत जरूरी है कि अगर मीडिया के धुरन्धर लोग घास न डाले तो छुटभैये पत्रकारों को अपने आस-पास मुस्कुराहट की थाली में पकवान परोस कर प्रसन्न रखना सोने में सुहागे का काम करेगा। नुस्खे बड़े कारगर हैं। अनुभव बताते हैं कि जिन लोगों ने इन नुस्खों पर अमल किया उन्हें कोई डिगा सकता है। शहर में चाहे जितना अतिक्रमण हटाने की मुहिम चलाई जाए, उन्हें कोई छू नहीं सकता है। नुस्खे पर ध्यान दें भगवान आपका भला करेगा।

अतिक्रमण करो, मगर सड़क पर नहीं

शहर के हर नुक्कड़ पर इन दिनों बस एक ही चर्चा है-‘अतिक्रमण हटाओ अभियान।’ पैन्ट उतार चड्ढी पहन अभियान। विनाश चैनल पर विकास का बाइस्कोप। बात भी एकदम सौ परसेन्ट सही है कि विनाश के बाद ही सृजन की प्रक्रिया शुरू होती है। वैसे अतिक्रमण हटाओ अभियान से अपने को क्या लेना देना? लेकिन सोचने वाली बात यह है कि जब लोग कहा करते थे कि ‘तेरा मुण्डा बिगड़ा जाये’ तो किसी को फिक्र नहीं रही। जब ‘मुण्डा’ बुरी तरह बिगड़ कर नगर की डगर तक पसर गया तो सुधारने की फिक्र चर्रा रही है। अपने पड़ोसी पंडित जी का भी यही हाल है। पहले तो अपने दुलरूआ नाती को अपने पक्ष में करने के लिए बड़े-बडे़ सब्जबाग दिखाते रहे। अब उनका दुलरूआ नाती उन पर हावी होने लगा तो उन्हें उसे सुधारने की चिन्ता सताने लगी। कई लोगों ने पंडित जी को समझाया भी कि अब सिर से पानी ऊपर हो चुका है। ऐसा न हो पंडित जी कि आप के सुधारवादी सिद्धान्त का दुलरूआ पर उल्टा असर हो और ऐसा कोई हादसा हो जाये जैसा कि कुछ दिन पहले राजधानी की खुली सड़क पर हुआ था?
बहरहाल अतिक्रमण हटाओ अभियान है तो बड़ी बढ़िया चीज। रेगिस्तान में नखलिस्तान का मुलम्मा चढा़ने का तरीका अच्छा है पर यहां तो जिन्दगी के हर मोड़ पर अतिक्रमण होते देखा जा रहा है। कानून की सड़क पर क्राइम को अतिक्रमण करते देखा जा रहा है। रोशनी पर अंधेरे के अतिक्रमण से लोगों की हक्की-बक्की गुम है। परीक्षाओं में पेपर आउट का अतिक्रमण और बची खुची नौकरी में भाई-भतीजा एंव बिरादरीवाद का अतिक्रमण खुलेआम देखा जा रहा है।
भई, जब अतिक्रमण हटाओ अभियान के लिये जिले के अलम्बरदारों ने कमर कस ही ली है तो फिर लगे हाथ उधर वाले अतिक्रमण भी हटाने की मुहिम छेड़ दी जाए। इससे बढ़िया मौका फिर नहीं मिलेगा। तौबा है, मरदूद जीप और टैक्सी वाले किस तरह सवारियों को अतिक्रमण का शिकार बना कर ठूंसते है कि लगता है बकरीद के बाज़ार में दुम्बे और बकरे ले जाये जा रहे हैं। मगर अभी तो जिलों से लेकर राजधानी तक के नम्बरदारों का ध्यान जाता नहीं दिखाई दे रहा है। वजह क्या है? यह तो वही जाने। वैसे भई इंसाफ तो यही कहता है कि जरा एक नज़र उधर भी। अब यह भी मुमकिन है उन अतिक्रमणों की तरफ से ध्यान हटाने के लिये इधर का अतिक्रमण हटाओ अभियान चालू कर दिया गया है। क्योंकि उधर के अभियान के लिए सांसदो, विधायको और मफियाओं से पंगा लेने की अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। इधर वाला मामला बिल्कुल हलुआ है। जिसे चाहो गिराओ, जिसे चाहो बचाओ। वैसे मैं अतिक्रमण हटाओ अभियान की बहुत कद्र करता हूँ। है बड़ी अच्छी चीज। जो लोग इस शुभ काम में लगे है भगवान उन्हें उम्रदराज़ करे और ताकत दे कि बड़े से बड़े अतिक्रमण पर अपना बुल्डोजर चलायें। अमीन। लेकिन एक बात दिमाग की टाटपट्टी पर नहीं बैठ पा रही है कि अतिक्रमण के अंगने में मजिस्ट्रेट साहब का क्या काम? जब एकतरफा ही कार्रवाही करना है तो कोई भी कर सकता है। उसके लिए तो अपनी पुलिस को बाकायदा डिग्री हासिल है। अच्छा इसके लिए किसी काले कोट वाले से कन्सल्ट करना पड़ेगा। अरे हां याद आया। शायद कहीं गोली-वोली चलवाने की नौबत आने पर उनका रहना जरूरी हो? भई अतिक्रमण हटाओ अभियान वाले इस नाचीज़ से ज्यादा बुद्धि के अमीर होते होंगें।

एक हवेली सूनी-सूनी सी...

जी, यह है मार्टिन बर्न के जमाने की ऐतिहासिक इमारत। है तो बहुत पुरानी मगर उसकी खीसें काढ़ती एक-एक ईंट शहर को जगमगाने का दावा कर रही हैं। मार्टिन बर्न तो शायद अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं। उनके जमाने को मधुर स्मृति भी खो चुकी है पर उनके वक्त की यह बे पेवन्द बिल्डिंग शहरवालों की जान ले रही है। सुना है आजकल यह ‘पाकीज़ा’ किसी बिगड़ैल ठाकुर साहब की रखैल बनी हुयी है। इसलिए इन दिनों शहर वाले इसे ठाकुर की हवेली कहने लगे हैं। जमींदारी और ताल्लुकेदारी छिन जाने के बाद जैसे उनकी हालत भीतर से खस्ताहाल हो गयी है।
उसी तरह विरासत में मिली किसी जमाने की यह बिल्डिंग धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील होती जा रही है। फाइलों पर चमगादड़ बीट करते हैं। दीमकों का अन्दाज़ ऐसा निराला है किसी नूर मुहम्मद का नाम सिर्फ मुहम्मद रह गया है और कोई शर्मा, वर्मा बन चुका है। मुझे उस दिन हैरत हो गयी जब सरजू पंडित अपना शिजरा ढूंढने के चक्कर में गश खा कर गिर पड़ा। टुट्ही कुर्सी और चरमराती मेज को ढकेल कर इमारत में टांग पसारे बैठे लक्ष्मीभक्त बाबू नुमा परोपकारी जीवों ने उसे उठाने के लिए एक सप्ताह पुराने पानी के छीटें मारना शुरू किया तो अपने आसन पर स्वशासन करते किसी खपरचिट्ठू बाबू ने मुस्कराते हुए कहा कि अमां रिकार्ड तो दीमक चाट गये। कब इन्हें रोशनी से नवाज़ा गया यह तो कब्र से उठकर मार्टिन बर्न साहब आवें तब ही मालूम हो सकता है। भई यहां इसलिए कम्प्यूटर भी नहीं रखा गया है कि यह सब ढूंढने के झमेले में कौन पड़े? उससे कहदो कि दो-चार दिन बाद मुझसे मिले। काम हो जायेगा।
कुछ देर के लिए मैं भी सकते में आ गया। ठाकुर को अपनी फटेहाल इमारत पर जरा भी शर्म नहीं आती है। कुछ तो मरहूम मार्टिन साहब की आत्मा की शांति के लिए इस तवारीखी इमारत की कायापलट के लिए हाथ पैर मारा होता। फर्नीचर और फाइलों के साथ किताबों को करीने से रखाया जाता ताकि आने वाली पीढ़ियां ठाकुर की शौकीन मिज़ाजी के चर्चे करते। कम से कम बाईपास वाले बाबू साहब की हवेली और उसमें रंगबिरगें फूलों से सजी क्यारियों से कुछ तो सबक लिया होता। शहर को जहां विरासत में गुलाबबाड़ी और मकबरे के साथ सरकिट हाउस के लिबास पर गुमान है, वहीं किसी सुनामी लहर के नहर में डुबकी लगाकर पकीज़गी के पर्याय बने ठाकुर दी ग्रेट को अपनी इमारत को नियामत समझकर अपने लिए न सही शहर की शान के लिए कुछ करना चाहिए। फिर सामने चकचक करते पुलिसिया लैन और अशफाकुल्लाह चौराहे का भी तो कुछ ख्याल होना चाहिए। कहने वाले कह गये हैं कि देखा देखी पुण्य़ और देखा देखी पाप। अब यह बात दीगर है कि ठाकुर साहब लेट मार्टिन बर्न साहब की इस हवेली को लखनऊ के बेलीगारद की तरह ज्यों का त्यों रखने की जिद पर अड़े रहने की जिद पर अड़े रहने की कसम खा रखी हो।
अगर यही बात है तो ठाकुर की हवेली के चारों ओर फैले रोशनी के जगंल में बिलबिलाते मलेरियायी मीटर रीड छाप भयानक कीटाणुओ के अण्डे-बच्चे क्यों फैलते जा रहे हैं? सुना है ये अण्डे-बच्चे अब तो घर-घर घुस कर डंक मारने पर उतारू दिखने लगे हैं। जहां किसी सीधे-सीधे को बैठा देखा उसी को डंक मार दिया। भई, मेरी नज़र में उससे तो कहीं अच्छे मलेरिया के ओरिज़नल मच्छर हैं जो कम से कम काटने के पहले भनभना कर अल्टीमेटम तो देते हैं। सबसे ज्यादा अफसोस तो सरकार की सरपरस्ती पर होती हैं जो दो बूंद जिन्दगी की पिलाकर अपनी रियाया के सेहत को बनाना चाहती है। एड्स और कैंसर के वायरसों से बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही है। मगर गोद लिये इन मीटर रीड छाप कीटाणुओं के अण्डे-बच्चों से निजात दिलाने में बिल्कुल नाकामयाब हैं जबकि सुना है कि यह उन कीटाणुओं के ओरिजनल अण्डे बच्चें नहीं हैं। रोब रंग ऐसा जैसा कि हवेली के ठाकुर खुद पहुंचे हुए हैं।
मुझे और मेरे जैसे भोले-भाले लोगों के घर में एक दिन जब ऐसा कोई खतरनाक वारयस कलम मुंह में दबाये हमारे नंगे बदन पर चढ़ गया और मुंह समोसे की तरह तिकोंना बनाकर बोला कि यार तुम्हारे बदन में इतना कम खून क्यों हैं? तो हमारे पास सिर्फ यही जवाब था कि खून बढ़ाने की दवा कहां मिलती है? यार बता दो।
बस उसने आव देखा न ताव कुच्च से डंक गड़ा दिया। बाद में कुछ जानकारों ने बताया कि इनका कोई अपना वजूद नहीं है। ठाकुर ने जैसे इस हवेली को रखैल बना रखा है उसी तरह हवेली के जंगल में पालतू मीटर रीडर नामक कीटाणुओं ने इन्हीं मीटरों की महक सुघां कर पाल रखा है जो कहते फिरते हैं कि सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का? गजब की है यह हवेली और गजब का है यहां दिनोंदिन पसरता जंगल। जंगल के जीवों के डंक मारने की दवा ठाकुर के पास भले न हो पर टांग पसारे बैठे बाबू छाप डॉक्टरों के पास जरूर है।

बुर्जुग बने सीनियर सिटीजन

माना कि जमाना जवानों का है। रानी मुखर्जी और विपाशा बसु का है। आर्केस्ट्रा और पॉप म्यूजिक का हैं। जमाना चाऊमिन और पिज्जा का है, पर मुझे तो अभी भी इतवारिया के मुंहफट घरवालों के हाथ का बाटी-चोखा बहुत पसन्द है। चोपई उस्ताद की नौटंकी आज भी बहुत याद आती है। सुरैया और मल्लिका-ए-तरन्नुम् नूरजहाँ के गाने आज भी कान में बजा करते हैं।
मैं जानता हूँ कि उगते सूरज को सब प्रणाम करने में विश्वास करते हैं। लेकिन डूबते सूरज की लालिमा में थोडी़ देर के लिए भूल जाने का मज़ा कुछ और ही होता हैं। जिसे नाजुक मिजाज़ कला के पारख़ी लोगो ने शामें अवध कहा है।
यह सारी बातें करने का मकसद सिर्फ उन नेग्लेक्टेड लोगों की दीन दशा पर गौर करना है जिन्हें खुश करने के लिए ‘सीनियर सीटिज़न’ यानी वरिष्ठ नागरिकता का तमग़ा पहनाया गया हैं। वैसे ही इस मुल्क में तमग़ो, पुरस्कारों और उपाधियों का अस्तित्व क्षणभंगुर होता हैं। उसके बाद तो बात पुरानी पड़ जाती है और आखिर में ऐसे फटेहाल लोगों को या तो कौड़ियों के भाव कबाड़ी को बेचना पड़ता है या आने वाली पीढ़ियों को उनके बाप-दादों की बहादुरी बख़ान करने के लिए सहेज़ कर रखना पड़ता है।
मैं उन लोगों की बात नहीं कर रहा हूँ जो सीनियर सिटीज़नों की सीरीज में शामिल होते हुए भी अच्छी खासी कमाई के रास्ते पर एक्टिव बने हुए हैं। मैं उन बेचारे निरीह सीनियर सीटीजनों की बात कर रहा हूँ जो सीनियर सिटीजन का सम्मान हासिल करने के बाद खुश तो बहुत हैं। पर उनके दिल रो रहे हैं। उनकी इवैलिड जिन्दगी को तब भी धक्‍के खाने को मि‍लते थे। आज भी वही धक्के मिलते हैं और उस पर से शोशा यह कि आप तो देश के सीनियर सिटीजन हैं। जवानों की भीड़ इस देश की घिसीपिटी संस्कृति के अनुसार चरण तो स्पर्श करती है लेकिन कुछ दूर चलकर फब्ती कसती है ‘न जाने कहां से बुढ्ढा कबाब में हड्डी बनने आ जाता है।’ मैं जानता हूँ कि इस बात को हमारे सत्ता और विपक्ष में बैठने वाले नहीं महसूस कर सकेंगें क्योंकि सीनियर सिटीजन की कैटेगरी में रहने के बावजूद भी जिन्हें वही सम्मान और आदर मिल रहा है। मंहगी कारों, अच्छे वेतन और सर्वोच्च ओहदों पर बैठे लोगों को क्या पता कि अभाव में जीने वाला एक सीनियर सिटीजन कैसे जीता है? नमूना हाजिर है एक तो इन्कमटैक्स की मार दूसरे बैंकों का सीनियर सिटीजनों के प्रति मुंह सिकोड़ रवैया। पहले ही न जाने की कुलच्छनी भाषा में मैनेजर साहब सुनाते हैं ‘भई माना कि सरकार ने आप को सीनियर सिटीजन के तमगे से नवाज़ा है मगर आप को मौत के किनारे से नहीं बचाया है। आप को मौत के किनारे से नहीं बचाया है। आप कब अल्लाह को प्यारे हो जायेंगें किसी को पता नहीं हैं। ऐसे में बैंक आप को बड़ा लोन देकर गलती नहीं कर सकता है। चाहे बेटे की शादी करें या बेटी की? ऐसे फटीचर बनने की जरूरत क्या थी? न पैदा करते बेटी-बेटा। हाय-हाय अपने सामन्तो दा जो पैंसठ पार करने के बाद भी काली कोलकाता वाली की कृपा से कम से कम मैनेजर साहब से ज्यादा एक्टिव दिखे। बेचारे प्रदेश से रिटायर हो चुके हैं। गारण्टर के साथ अचल सम्पति के ओरिजनल पेपर्स भी हाजिर करने को तैयार थे मगर नहीं हां में नहीं बदला। देखा आपने सीनियर सिटीजन होने का कमाल? अटल भैय्या या चन्द्रशेखर भैय्या वगैरह की बात ही अलग है। उन्हें लोन-वोन की जरूरत ही क्या होगी? अपने वित्तमत्रीं को शायद इन बुढ्ढे लोगो पर भरोसा नहीं हैं। अब रेल महान की बात ही कुछ जुदा है किराए में कुल तीस परसेन्ट की छूट यानी ऊंट के मुंह में जीरा। पहले लोग बुजर्गों को सिर-माथे चढ़ाते थे। मगर इस अपटूडेट जमाने के रेलवाले उन सीनियर सिटीजनों को सफर करने के लिये सेकेण्ड स्लीपर में धकेल देते है बशर्ते वह बूढा़ सीनियर सिटीजन धक्के खाते हुये रिजर्वेशन ले चुका हो क्योंकि कम से कम अपने शहर की आरक्षण खिड़की ने कोई जगह सीनियर सिटीजन और लेडीज के लिए अलग से व्यवस्था करने की जरूरत नही समझी है। अब देखिए जमाने का हाल कि जवान चले ए॰ सी॰ में और सीनियर सिटीजन का तमगा लटकाए माननीय लोग धक्का खाते हुए सेकेण्ड स्लीपर में। वाह रे देश महान्। जवाब नहीं तेरा। क्या सीनियर सिटीजन यानी वरिष्ठ नागरिकों को झूठी तसल्ली देकर मूर्ख बनाया है? मैं जानता हूँ मेरी बात को लोग मज़ाक समझ कर हसेंगें पर क्या उनका हंसना सही है? क्या इसी भारतीय संस्कृति का ढिंढोरा पीटा जाता है? क्या यही है न्याय और सदाचार हमारे बुजर्गों के प्रति? विशेष रूप से उन सांसद, विधायकों और मंत्रियों को सोचना चाहिए जो साठा के बाद भी पाठा महसूस करते हैं? घर बैठे उनके एक आदेश पर भारत को इण्डिया या हिन्दुस्तान में बदला जा सकता पर बुजुर्गो का ख्याल सिर्फ कागज पर...............।

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