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Wednesday, 31 August, 2005

कलमकारों की माया होली में

अमां कमाल है। लोगो की कलम कैसे कैसे करवट बदलती है? लिखने वाले कलम तोड़कर स्याही गटक जाते हैं। वह तो कहिए भला हो उनका जिन्होंने स्याही को सालिड बनाकर कलम में भर दिया वरना सभी लेखक मिलकर बरसाने में गाना शुरू कर देते ‘मेरा गोरा रंग लै ले, मुझे श्याम रंग दै दे।’ फिर समां जब होली का हो तो क्या कहने। भंग की तंरग में बेसुरे भी सुर में रेंकते-रेंकते दुल्लती चलाने से बाज नहीं आते हैं। लत्ती की आग में अगर कोई भला अनभला मानुष आ ही गया तो अंग्रेजी के सॉरी को हिन्दी में और सारगर्भित बनाते हुए कह दिया जाता है, ‘यारों बुरा न मानो होली है।’ होली के रंग का हुड़दंग तो इस नाचीज ने उस दिन राज्य सरकार की नाक के नीचे बसे गोमती नगर से लेकर नैना देवी के नैनों के पास फैले भीमताल, गाजी मियां के बहराइच और दिल्ली है दिल हिन्दोस्तान में देखा। सी.बी.आई. वाले उछलते कूदते छापे का ठप्पा मारते हुए कहे जा रहे थे कि बुरा न मानो होली है। इस नाचीज को उनके रंग में सने हुए छापों से थोड़ी सी दहशत तो हुई मगर इस चमत्कारी युग के रंग का चमत्कार जब समझ में आया तो समझ कर तसल्ली बख्श हुआ कि इसमें चिन्ता की कोई बात नहीं है। यह तो अपने बरसाने वाली लट्ठमार होली जैसी है।
बरसाने की लट्ठमार होली हमारी परम्परा का हिस्सा बनकर सुखद हो गयी है। फिर आज के होली में तो ऐसे-ऐसे चटख रंग देखने को मिलते हैं जो कुछ देर की हाय तौबा और कपड़े खराब हो जाने के डर को रंग उड़ाकर रंग को चमत्कारी बना देते हैं। शायद यहां भी होली के मौके पर ऐसा ही कोई रंग तैयार किया गया हो। तजुर्बे तो यही कहते हैं। होली में छापे नहीं पड़ेंगें, रंग से तरबतर नहीं होंगें और मुंह में कालिख नहीं पुतेगी तो कैसी होली? ऐसे मौके पर तो उन, धवल वस्त्रधारियों को न जाने कब से घोंटी जाने वाली भंग की तंरग में झूम-झूम कर गाना चाहिए ‘जय-जय शिवशंकर कांटा गड़े न कंकड़ प्याला तेरे नाम का पिया।’ पियो खूब छक कर के पियो और शान से अगली होली तक जियो। जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां? फिर भाई मेरे, होली के दिन दिल मिल जाते हैं तो फिर उनके छापों रंगों और कालिख का बुरा क्या मानना? शायद ऐसी ही कुछ कभी बरसाने की लट्ठमार होली भी रही होगी।
बाद में धीरे-धीरे चुपके-चुपके उनकी लाठियों और गालियों को अपने हक में दुआ समझकर बरसाने वालों ने अपने अनोखे ढंग से होली मनाने का रिवाज समझ लिया होगा। इसलिए तो कहना पड़ता है कि लिखने वालों का बस नहीं चलता है वरना वह ऊपर वालों की भी वीडियो रिकार्डिंग दिखाकर कहते कि उसके पास दुनिया भर की मिल्कीयत क्यों हैं? कहां से आयी? वह बेचारा होली के दिन दिल मिलाने के लिये खाइके पान बनारस वाला अपनी सोने की पिचकारी से रंग फेंकता और लोग उस पर लट्ठ बरसाते।
बुरा न मानों होली है। होली में बुढ़वा भी जवानी के जोश में कुलांचे भरने लगता है फिर लेखक तो लेखक है। होली में तो वह छुट्टा सांड बन जाता है। तभी तो कभी कलम से गंगा को पतित पावनी लिखता है तो कभी लिखता है ‘राम तेरी गंगा मैली हो गयी।’ अब होली की ठिठोली में कौन उनकी कलम को समझाये कि राम जी कहां से गंगा जी के बीच खींच लाए गये। अरे वह तो विष्णु के चरणों से निकली, ब्रह्मा के कमण्डल में रूकी और शंकर की जटा में समा गयी। हां थोड़ा बहुत सबूत दे सकते हैं तो श्रीमान भगीरथ। राम जी बेचारे को इस पचड़े में नाहक घसीटने की कोशिश की जा रही है। मगर होली है। किसको क्या समझाया जाए? यहां तो होली में बुढि़या भी भौजी बन जाती है। सब लट्ठमार होली में कलम के कलमकारों की माया है।

राहत की चाहत

इन दिनों मीडिया वाले खास तौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया वालों के पास बस तीन ही मुद्दे रह गये हैं। पहला सुनामी लहरों से हुयी क्षति के आंकड़े गिनाना, दूसरा सुनामी लहरों से दुनिया को बचाने के लिए साईंसदानो और ज्योतिषियों में नया जोश भरना और मदद के लिए लोगों से अपील करना। तीसरा मुददा है आज उनके सामने तमिलनाडु सरकार में राजनीति की सुनामी लहरों को नजदीक से पढ़ना। महीने पन्द्रह दिनों तक यही सिलसिला चला करता है। उसके बाद सब टॉय-टॉय फिस्स।
इस वक्त न तो आलू प्याज और न चीनी गुड़ के बढ़ते हुए दामों से देश की जनता को निजात दिलाने की कोई चर्चा हो रही है। हो भी रही है तो बड़ी दबी जुबान से हो रही है। सत्ता के गलियारे में मालपुआ उड़ाने वाले नेता जी से जब मैंनें चीनी की चाशनी पर बात की तो वह हंसते-हंसते लोट-पोट गये। कहने लगे यह तो बखुदा बहुत अच्छा हो रहा है। जोर का झटका धीरे से देते हुए उन्होंने फरमाया कि अब दो बूंद जिन्दगी के लिए हाय तौबा मची हुयी है। उसी के लिए कुछ लोग सन्नाटी रात में अपने बीवी के कान में फुसफुसाते सुने गये हैं कि मेरे दफ्तर चले जाने के बाद कोई आकर मिन्टुआ, चिन्टुआ और सादिया को दो बूंद जिन्दगी के बारे में कुछ कहे तो भीतर से दरवाजे की कुण्डी चढ़ा लेना क्योंकि मुझे तो इसमें भी कोई चाल दिखाई देती है। लोग तो यहां तक कहते हैं ये दो बूंद वाले हमारे बच्चों को नामर्दी का ड्राप पिला रहे हैं। एक मुल्ला जी ने तो कह दिया कि हमारे मजहब में तो बच्चों की पैदाइश को रोकना मना हैं। क्योंकि बच्चें अल्लाह ताला की नियामत हैं। इसी लाइन पर अगर सोचा जाये तो सुनामी लहरों का कहर बरपा करना कुदरत का करिश्मा हैं। जनसंख्या पर चिन्ता जताते हुए कभी माल्थस साहब ने रिसर्च किया था कि जब खाद पदार्थों की अपेक्षा जनसंख्या बहुत आगे बढ़ जाती है तो यूं ही प्राकृतिक आपदाओं से उन पर कहर बरपा करके एडजस्टमेंट किया जाता है। इसी तरह इम्पोर्टेड फ्रेम वाले चश्मे को नाक पर चढ़ाते हुए बोले—‘देखो भाई हमने मलेरिया जड़ से उखाड़ फेंका भले उसकी जगह लवेरिया पनपी हो। हमने दो बूंद जिन्दगी से पोलियो को भी लगभग खत्म कर दिया है। हाथी निकल गया बस दुम बाकी रह गयी है। उसे भी जोर लगाकर निकालने के लिए इस जमाने के बड़े-बड़े लोग लगे हुए हैं। अब आप ही सोचिए कि जब मलेरिया, हैजा जैसी खतरनाक बीमारियां देश में छूमन्तर हो सकती हैं तो साला यह शुगर वाला रोग क्यों नहीं भागेगा
? इसलिए उसे भगाने के लिए सबसे अच्छी तरकीब चीनी का दाम बढ़ाना है और बढ़ाते जाना है। सुर्ती मलकर नेता को खिलाते हुए एक और सवाल किया, किरासन तेल और गैस सिलेण्डर की बढ़ती मंहगाई पर आप क्या कहना चाहते हैं? इतना सुनते ही फौरन फर्श पर खैनी थूकते हुए बिगड़कर नेता जी बोले—अमां एकदम्मे से कूढ़मगज हो क्या? मोबाइल का दाम हम जो घटाते जा रहे हैं उसकी तारीफ क्यों नहीं करते जी? किरासन और गैस सिलिण्डर भी कोई मुददा है? पहले नहीं था तो क्या ढिबरियां नही जलाई जाती थी या लकड़ी के बुरादे पर बना खाना नहीं खाते थे? बातचीत चल ही रही थी कि कुछ लड़कियों का झुण्ड डिब्बा लिये दिखाई पड़ा। नेता जी फौरन कूद कर पीछे बैठकर यह कहते हुए नौ दो ग्यारह हो गये कि—कि चलूं नहीं तो अभी ये स्कूली लड़कियां गले पड़कर आपदा राहत कोष के लिए चन्दा मांगेगी। आखिर में झेलना मुझे पड़ा। आगे बढ़ा किसी तरह तो एक साहब जो सिर्फ कभी-कभी समाजसेवा का काम करते हैं और प्रायः बन्दे के धंधे का मौका ढूंढ़ा करते हैं। उन्होनें एक रसीदबुक थमाते हुए कहा ‘भैया यह रसीद है सुनामी लहरों से पीडत लोगों के सहायतार्थ चन्दा इकट्ठा करने के लिए। मैंने लाख समझाया कि मैं अभी-अभी स्कूल की छात्राओं को चन्दा देकर आरहा हूं। मगर वह माने नहीं और बतौर उधार एक सौ एक की रसीद काट दी।
देने को तो मैंने दे दिया लेकिन है कि क्या गारण्टी जो यह रकम पीडि़तो तक पहुंच ही जाए? कई बार ऐसी आपदायें आती रहीं, लोग तबाह और बर्बाद होते रहें और सहायता के नाम पर ठगे जाते रहे लेकिन जनता की जनता के लिए और जनता का प्रोग्राम गतालखाते में ही जाने की खबर लगी रही। मैं छोटी सी जुबान वाला एक अद्द मामूली आदमी कह ही क्या सकता।

लाश वही है सिर्फ कफन बदला है

मेरे विचार से कुदरत की कारगुजारी भी कुछ कम नही है। इन्सानी जीव को उसने ऐसे फुर्सत के वक्त गढ़ा है कि जरूरत पड़ने पर उसके चेहरों के गेटअप को किसी भी तरह के मुखौटों से बदला जा सके। चेहरे वही रहते है सिर्फ मुखौटे बदल जाते है और यह एक ऐसा निरीह प्राणी है कि वक्त की नजाकत और मुखौटे की रंगत के हिसाब से अपने को ढाल लेता है, लेकिन कमाल यह है कि कुदरत ने इस रंगमंच पर कुछ करेक्टर ऐसे खड़े कर दिये जिनकी इमेज अजर-अमर हो कर रह जाती है। लगता है कि उसके कथानक में विलेन छाप करेक्टरों की अपनी अलग इमेज होती है, जिनके इर्द-गिर्द सारी कहानी घूमकर अपना प्रभाव डालती है।
कलियुग तो कलियुग है, लेकिन सतयुग, त्रेता और द्वापर में भी उन लोगों का बोलबाला रहा है। उस जमाने में भी रावण, कंस और उनके गुर्गो के रोल काफी अहमियत रखते थे। उस समय भी उनके चैलेंजिंग रोल को देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते थे। उस समय भी सीता का अपहरण और द्रोपदी के चीरहरण के सीन को देखकर, देखने वाले ‘उफ’ कह उठते थे। कुदरत ने कहानी को एक मोड़ देने के लिए इन्सानी जानों में कुछ ऐसे पात्रों की आकर्षक इण्ट्री करा दी कि लोगो को कहने पर मजबूर होना पड़ा कि सत्य की असत्य पर विजय होती है। रावण, दुःशासन, कंस और महिषासुर मंच पर पराजय की एक्टिंग को जीवंत बनाते हुए गिरे जरूर, मगर तभी लाइट आफ कर दी गयी उसके बाद कुदरत ने कुछ ऐसे मुखौटे लगाकर मनुष्य रूपी जीव के चेहरों पर फिट कर दिये और शान-शौकत का तमगा लटका दिया कि देखने वालों के मुंह से अपने आप बाअदब-बामुलाहिजा होशियार निकल पड़ा। गुलामों की तरह उनके सामने गिड़गिड़ाते रहे और लगान के नाम पर उनके कोड़ों की मार से आहें भरते रहे। जगह जमीन से बेदखल होकर सिर्फ फरियादी घंटा बजाते रहे और आश्वासनों से कलेजों को ठण्डा करते रहे। बहरहाल वह सीन वहीं खत्म।
फिर लाइट आन हुई तो नयी सीन शुरू हुई। सूत्रधार ने पब्लिक को मुंह चिढ़ाते हुए बताया कि यह पब्लिक है पब्लिक, सब जानती है—यह कलियुग का सीन है। बहनों, भाभीयों और भय्याओं। पब्लिक प्रजातंत्र के तेज प्रकाश में काफी तल्लीन दिखी। मगर कथानक के इस भाग में उसने विलेन प्रधान दृश्य देखे।
एक-दो रावण नहीं कई-कई रावण। एक-दो दुःशासन नहीं कई-कई दुःशासन, कई-कई द्रोपदियों के चीर खींचते दिखायी पड़े। पब्लिक में से कुछ लोगों को मजा आ रहा था तो कुछ लोगों ने आब्जेक्शन किया
-तभी डॉयरेक्टर मटकते हुए मंच पर अवतरित हुआ और बड़ी बेदर्दी से माईक खींचते हुए बोला—जिन्हें देखना हो देखें वरना जंगल में जाकर धूनी रमायें। हम आज की इस सीन को उड़ा नहीं सकते है क्योंकि इन्हीं की बदौलत तो हमें डॉयरेक्टरशिप मिली है। फिर हम तो वही कर रहें हैं जो हमारी परम्परा रही है। हमारे चेहरे आप ही जैसे हैं, लेकिन जानदार एक्टिंग के लिए शानदार मुखौटे लगाकर आपके सामने हाजिर हुए हैं। आप चिल्लाया कीजिए हम पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं हैं।

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