लोगों में गजब की बेचैनी है। दौड़ती दुनिया के साथ दौड़ने वाले अक्सर बेतुका सा सवाल पूछते हैं 'अमाँ भाई यह दुनिया जा किधर रही है? है न बेतुका सा सवाल? जैसे मैंने दुनिया का ठेका ले रखा है। जाहिर सी बात है कि आज कि तारीख में खुद दुनिया बनाने वाला उतर आए तो उसकी समझ में नही आएगा कि उसकी बनाई दुनिया किधर जा रही है?
इसके अलावा जुगराफिया की जमात में दिखने वाला ग्लोब तो हैं नही दुनिया, जिसकी चाल समझ में आ जाए। वही मसल है न कि काजी साहेब क्यों दुबले, शहर के अन्देशे। बड़े-बड़े बहे जाए गदहा कहे केतना पानी? अरे भाई किधर कहां कौन जा रहा हैं अगर वही बूझना है तो अपने खानदान पीकदान को देखकर पता लगाओं की वे कहाँ थे, अब कहाँ हैं? अपने गाँव टोले को क्यों नहीं देखते कि वे किस पगडण्डी पर पग बढ़ाते जा रहे हैं? दुनिया तो बरसों से एक ही धुरी पर नाच रहीं हैं। भले खरबूजे की फॉकों की तरह हो लेकिन हर फॉक यही कहते सुना जाता है हम अपनी संस्कृति, आपना कल्चर नहीं भुला सकते हैं। दुनिया तो दूर क्यों न हम अपनी फॉक का जायजा लें? बकौल अपने मीरसाहब के अब न तो लखनऊ के वैसे खरबूजे रहे और न मलीहाबादी वह दशहरी। सबका जायका बदमजा हो रहा है क्योंकि मियां अब गोबर की वह सड़ी खाद तो कोई पूछता नहीं। सब उसे क्या कहते हैं यूरिया, डाई और न जाने कौन-कौन सी अंग्रेज़ी खाद से जल्दी व ज्यादा से ज्यादा फसल बेचकर अमीर बनने के चक्कर में हैं। मीर साहब की बात मैं गंभीरता से लेकर सोचता हूँ सच ही किसी ने कहा हैं कि खत का मजमून भांप लेते हैं लिफाफा देखकर। ' दुनिया किधर और कहां जा रही है?' जवाब मीरसाहब की बात से खुद मिल जाता हैं। लोग किराये के भोंपू पर एयरकन्डीशन्ड हाल में पड़ी आरामकुर्सी पर पसरे हुए 'लोकगीत, लोककला और लोक संस्कृति' पर बड़ी-बड़ी बातें करते हैं पर ध्यान से उनका शिजरा पढ़ने पर पता चलता है कि ऐसे लोगों ने खुद ही गाँव में रहना नापसन्द किया है। वही नहीं उनकी ताजा पीढ़ी 'अंकल आण्टी' की चार लाइन छः लाइन सड़को पर तेज रफ्तार बाइक रेस में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना पसन्द करने लगे हैं। जब यह हाल है अपने गांव मुहल्ले और परिवार का तो दुनिया कहाँ, किधर जा रही है के चक्कर में पड़ना बेकार है।
उस दिन मैंनें हैरत भरी नजर से एक बूढ़े आदमी को रोते हुए देखा जो अपनी किस्मत को कोस रहा था। पूछने पर फफक कर रो पड़ा। बताने लगा भय्या गया था अपने लड़कवा को खर्चा पानी देने शहर। वह वहीं बड़की कक्षा में पढ़ रहा है। बोर्डिंग में रहता है। किसी तरह उसके कमरे में पहुँचा तो देखा वहां चार-छः अमीर घर के लड़को का जमावड़ा लगा हुआ था। मुझे देखते ही उसके चेहरे की रंगत उड़ गयी। फिर मुझे एक किनारे ले जाकर खर्चा पानी लेने के बाद लगा डाँटने कि यहाँ आने की क्या जरूरत थी? जानते नहीं तुम्हें देखकर इन लोगों के बीच मेरी क्या पोजीशन हो गयी? कितने अरमानों के साथ मैं उसके पास गया था लेकिन उसने बिना दाना पानी पूछे उल्टे पैर वापस करके फिर कमरे मैं चला गया। भरे दिल से मैं लौटा तो इतना जरूर मेरे कान में सुनाई दिया कि अरे पापा ने नौकर को किसी काम से भेजा था। समझ गया कि दुनिया किधर जा रही है? बिग बाजारों का जमाना है। दुनिया फैशन शो का रैम्प बन गई है। सामने वाले पान की दुकान पर दो चार हमउम बस एक ही सवाल पर चोंचे लड़ा रहें थे कि दुनिया किधर जा रही हैं? कोई अपने को तालीमयाफ्ता जाहिर करने की कोशिश करते हुए बता रहा था कि सब ग्लोबल वार्मिंग का असर है। मौसम पर असर पड़ता है तो जाहिर है कि लोगों के मिजाज पर भी असर पड़ेगा। अब्बा बप्पा और 'पिताश्री' पर हिमालय के उस पार वाली ठड़ी हवाओं का ऐसा असर पड़ रहा है कि वे डैड वैली में घुसे जा रहें। उधर हिमालय के ग्लेशियर पिघल कर हिमालय को छोटा कर रहें हैं तो इधर हाड़कँपा देने वाली हवायें माओं को मम्मी बनाकर शोरुम में सजा रही हैं। अब वह बात बीते जमाने की हो गयी जब हिमालय साइबेरियन हवाओं से रक्षा करता था। गाँव तो गाँव शहर तक ने अपने कल्चर को सुरक्षित रखा था। अपनी अलग पहचान बरकरार रखा था। अब लोगों का रोना है कि दुनिया किधर जा रही है और मेरा रोना है कि अपने गाँव मुहल्ले किधर जा रहे हैं? सब धान बाइस पसेरी की तरह सबके लिए अन्कल आन्टी का जो आविष्कार कर दिया है। ऐसा लगता है जैसे हम सब किसी फैशन शो के रैम्प पर खड़े होकर अपने को ज्यादा से ज्यादा सुन्दर और सुशिक्षित दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। गहरे मेकअप में वे तिल और मस्से खो गये हैं जिन्हें हमारे यहां बहुत शुभ माना जाता था। इसलिए कोई गिला शिकवा करना मना है।
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Monday, 10 March, 2008
हम किधर जा रहें?
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3 टिप्पणियाँ:
सुन्दर! गहरे मेक अप में तिल और मस्से हो गये है जो कभी सौन्दर्य की निशानी माने जाते थे। अच्छा लगा! लिखते रहें, दुनिया का जुगराफ़िया बताते रहें।
जो हुआ, अच्छा हुआ। जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है। जो होगा, अच्छा ही होगा। समय और समाज का प्रवाह है। सौंदर्य के प्रतिमान बदलते हैं, बोलचाल बदलती है, लहजा बदलता है। आपने जो लिखा है, वह सच तो है, लेकिन पूरा सच नहीं है। आईआईएम और आईआईटी के लड़के अब लाखों की नौकरियों को लात मारकर समाज की सेवा करने के लिए कमर कसने लगे हैं। संस्कृति को भी उन्नत करने का काम कर रही है नई पीढ़ी।
बहुत अच्छा। आपके परिचय के लिए कहां जाएं ?
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