Friday, 6 January, 2006

स्वदेशी अंगना, परदेशी बिजली

स्वदेशी अंगने में परदेशी बिजली का क्या काम? यूं तो स्वदेशी बैठक में ‘परदेशी-परदेशी’ गाना खूब जमता है लेकिन कभी किसी परदेशी के आ जाने पर सबके चेहरे का नक्शा बदल जाता है। अब यह तो अपने मिजाज़ की बात है। उनका भी जवाब नहीं जिन्होने ‘नमस्ते सदा वत्सले’ गाते हुए अचानक ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ गाना शुरू कर दिया। एक वो लोग भी थे जिन्होनें महाराणा प्रताप की जन्मभूमि को नमन करते हुए दिलफेंक परदेशी क्लिंटन के साथ राजस्थानी बालाओं को नचवा दिया। जो कुछ भी हो। भारतीय संस्कृति का सबक उन्हीं से सीख कर इतना बोलने का साहस कर पा रहा हूँ कि स्वदेशी अंगने में परदेशी बिजली का क्या काम? आज न जाने क्यों लोग बिजली के लिए अपना माथा पटक रहें है।हंगामें कर रहे हैं। हड़ताल पर करताल बजाते हुए परदेशी बिजली को पटाने के लिए गा रहे हैं ‘हम तुम एक कमरे में बन्द हों और चाभी खो जाये। वाकई में अपने देश के लोग इतने सीधे-साधे हैं कि जैसे अल्लाह मियां की गाय। भूल गये उस परदेशी मैकाले को जिसने हमारे दायरे को कब्रिस्तान का रास्ता दिखा कर उनकी जगह ‘अंकल-आंटी’ की घण्टी बजवाना शुरू कर दिया। वैसे मार्टिन बर्न ने बर्निंग ट्रेन क्या चलाई कि हमारे घरों के दिये-बाती बुझ गये। हमारी महफिलों में रोशन होती शमाओं को गुल कर, हमारे हाथ में थमा दिये बिजली तेज पावर वाले गोल-गोल लट्टू। हम गानां भूल गये कि गोरा रंग लै ले हमे श्याम रंग दै दे। बल्कि हम परदेशी बिजली की तेज रोशनी में गुसुल करते-करते सब कुछ भूल बैठे। तारीफ की बात यह रही कि स्वदेशी संस्कृति का दम्भ भरने वाले खुद उस हमाम में ऐसे डूबे कि वे भूल गये कि बाहर लोग उनका इन्तजार भी कर रहें हैं। खोद खोद-खोदकर स्वदेशी संस्कृति के मुर्दो को जिन्दा करने का दावा करने वाले खुद बिजली के बेमिसाल लट्टू थामे बेखुदी से उन्हीं को पुकारते चले गये। कभी तो समय रहते सोचा होता कि स्वदेशी अंगने में परदेशी बिजली का क्या? इसलिए भैया बिजली के लिए हो-हल्ला मचाना बेकार, तोड़-फोड़, मारा-मारी करने से कोई फायदा नहीं हड़ताल पड़ताल करने से कोई नतीजा हासिल होने वाला नहीं है। क्योंकि दिल्ली से दौलताबाद तक वालों की दिली मशां यही है कि हम फिर से दिया बाती वाले युग में गाते हुए ‘आ अब लौट चलें’ की तर्ज पर वापस हो जाए। अगर ऐसा न होता तो रथों पर रथ निकालने से लेकर विदेशों में फिल्म फेस्टीवल मनाने की ऊर्जा इकट्ठा करके अपने देश को न ऊर्जावान बनाया जाता? जो प्योर स्वदेशी होती। उन्हें चिन्ता करने की क्या जरूरत क्योंकि उनके आफिसों से लेकर अट्टालिकाओं तक में सरकारी गैरसरकारी जेनरेटरों से ऊर्जा का छिड़काव किया जा रहा हैं। रही हम जैसों की बात तो हमें तो ‘जीना यहां मरना यहां इसके सिवा जाना कहां’ हैं? बिजली रहे, उजाला हो न हो। उन्हें तो हमें पुरानी संस्कृति के स्टैण्ड पर रखे टिमटिमाते दिये की रोशनी में जीना सीखना हैं। इसलिए भाई और झनक-पटक करती बहनों भूल ही जाओ परदेशी बिजली का नाम। बस अंधेंरें में लुट-लुटकर जी बहलाने के लिए गाते रहो ‘मैंने चांद और सितारों की तमन्ना की, मगर हमें रातों की स्याही के सिवा कुछ न मिला।’

6 टिप्पणियाँ:

johneytheobold4752 said...

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रजनीश मंगला said...

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rqll6ps90mydo said...

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सुदामा सिहं said...

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AlterinG Abhishek said...

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Nishikant Tiwari said...

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NishikantWorld

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