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Sunday, 9 March, 2008

खिचड़ी भोज का लुत्फ

आजकल अपने लंगोटिया यार मीर साहब ‘खिचड़ी भोज’ के पीछे दीवाने बने हुए हैं। कहते हैं कि जितना मजा इफ्तार पार्टी में नहीं आता है उससे ज्यादा मजा ‘खिचड़ी भोज’ में आता है क्योंकि उसमें खाने वाले कई आइटम होतें हैं। खिचड़ी एक शार्टकट रास्ता होता है। भई खाने का मौज तो बस इसी में मिलता है। आए दिन अपने मीर साहब का नाम खिचड़ी भोज में शामिल होने की वजह से अखबार में फोटो सहित सुर्खियों में रहा करता है। यही नहीं, वे डकराते हुए कभी किसी गरीब की मढै़य्या के दरवाजे पड़ी खटिया पर पसर कर चांद सितारों की तमन्ना किया करते हैं। अक्सर ‘दिल्ली है दिल हिंदुस्तान का’ गाते हुए किसी खिचड़ी भोज में शामिल होकर गुडफील का मजा लेने से जरा भी हिचकिचाते नहीं हैं। भले इसे कुछ जलनशील लोग नौटंकी का नाम दें। हां, यह जरुर है कि इस हाड़ गलाने वाली सर्दी में कुछ पुलिस वालों और खबरिया चैनल वालों को भाग दौड़ करने में मुसीबत जरुर होती है।
अब रही अपनी बात तो वह अलग है। मैं तो अपनी घोंसलेनुमा घर में फटा कम्बल ओढ़े आज के खिचड़ी-भोजों और टूटी खटिया पर पड़े-पड़े महसूस करता हूं कि इस बदलते मौसम में पूरा का पूरा मुल्क खिचड़ी मय हो गया है। बस डर है तो बस ‘कोल्ड डायरिया’ का। किंतु सपने भी देखता हूं तो खिचड़ी का, खिचड़ी खाने का और बनाने का। किसी कम्बल बांटने वाले का शोर शराबा और गश्त करते पुलिस वालों के डंडों की ठक-ठक सुनकर पक्का यकीन हो जाता है कि सचमुच मैं एक खिचड़ी युग में जी रहा हूं। मैं तो भाई यही ‘फील’ कर रहा हूं और अपने विचार से ठीक ही फील कर रहा हूं क्योंकि बहुत से इबादत गाहों में आज भी खिचड़ी का बोलबाला है। काफी समझबूझ कर खिचड़ी भोग लगाने और भक्तों को प्रसाद स्वरूप बांटने का सिस्टम अपनाया गया है। अब यही समझने की बात है कि पहले किसी-किसी के घर कभी-कभार खिचड़ी पका करती थी लेकिन आज तो पूरा देश खिचड़ी का शौकीन दिख रहा है। मेरी समझ से यह खिचड़ी युग चल रहा है। हर जगह चाहे देश हो या प्रदेश सब जगह खिचड़ी परोसी जा रही है।
पहले तो दाल अलग और भात अलग परोसने का रिवाज था। यानी राजा-प्रजा के बीच एक स्पष्ट रेखा खिंची होती थी। वह था सामंतवादी या राजशाही का जमाना। उसके बाद लोगों के मिजाज में परिवर्तन आया। भात फैलाकर उस पर छौंकी बघारी दाल के साथ सब्जी या सलाद वगैरह लेकर खाने का रिवाज शुरू किया गया। इस नए अंदाज को लोगों ने पूंजीवादी प्रवृति का नाम दिया। कभी अपने मीर साहब के मिजाज का आलम यह था कि विदेशी मक्खन के बिना निवाला उनके गले के नीचे नहीं खिसकता था। नए जोश और पुराने इतिहास का वास्ता देकर लोगों ने महाराणा प्रताप की तर्ज पर घास की रोटियां खाने का ड्रामा पेश करना शुरू कर दिया। जिन्हें चुपड़ी रोटी और बिरय़ानी हजम नहीं हो सकती उन्होंने दलील देना शुरू कर दिया कि भारत गरीबों का देश है। इसलिए समाजवादी आंगन में पत्तल पर रूखी सूखी खाने का रिवाज अपनाया था। सोचा चलो किसी को हम गरीबों की फिक्र तो हुई। पर कुछ खास लोगों के सामने सिर्फ नाम का पत्तल बिछाया गया जिस पर परोसी जाने लगी तहरीनुमा खिचड़ी और खिचड़ी के संग उसके तीन यार पापड़, दही घी, अचार। इसी तरह एक ही मुल्क में एक साथ सामंतवाद, पूंजीवाद और समाजवाद की खिचड़ी से सब खिचड़ीमय हो रहा है। कहीं गरीबों के देश में समाजवाद का सीन देखते-देखते गरीबों नें खुदकशी करनी शुरू कर दी और कहीं सिन सिनाकी की बुबलाबू के बोनट पर बैठकर सारे शहर को जलता हुआ देखकर बांसुरी बजाने का शौक चर्राने लगा। यानी सब कुछ बिलकुल खिचड़ी की तरह। ढूंढते रह जाइए दाल के दाने चावल और मटर बिलकुल उसी तरह जैसे आजकल की मसाला फिल्में। पहले हीरो-हीरोइन, कामेडीयन और विलेन अलग-अलग होते थे पर आज सब कुछ एक ही हीरों में देखने को मिलने लगा है। भगवान भला करे, ऐसी खिचड़ी खाकर डकार लेने वालों का। यहां तो मोहल्ले के आवारा लौंडे चिढा़ते हुए कहते हैं, ‘आधी रोटी बासी दाल, खा ले बेटा बाबूलाल’।

स्वयंवर होना चाहिए।

भाई सुना है, पढा़ है कि पुराने जमाने में स्वयंवर का आयोजन किया जाता था जिसमें कन्याएं बन-ठन कर आए राजे-महाराजाओं का बड़े ध्यान से जायजा लिया करती थीं और जो पसंद आता था, उसे जयमाल पहना कर अपना जीवन साथी बना लिया करती थीं। जैसे-जैसे दिन बीतते गए और शोरे पुस्ती बढ़ती गई, लोग जबरन अपने गले में जयमाल डलवाने के लिए अपनी शक्ति का साइनबोर्ड टांगे हुए स्वयंवर में तशरीफ ले जाते थे। पृथ्वीराज चौहान और संयुक्ता का स्वयंवर कुछ इसी तरह का हुआ था। फिर आजकल तो अगवा करके धीरे से कोर्ट मैरिज करने की परम्परा बडी़ तेजी से दौड़ रही है। अब मुल्क में देखा जा रहा है कि ‘भारत रत्न’ सम्मान के स्वयंवर में रोज एक न एक अपना पूरा शिज़रा लिए हुए बन-ठनकर हाजिरी लगा रहें हैं। कुछ तो इस तलाश में हैं कि स्वयंवर में घुसकर संयुक्ता रूपी ‘भारत रत्न’ सुंदरी को ले उड़ें। ताज्जुब तो भाई यह हो रहा है कि जुमा-जुमा सात दिनों के लिए बने राजा भी पीछे नहीं रहना चाहते हैं। वैसे अपने को तो उसे हासिल करना नामुमकिन है। क्योंकि न तो अपने पीछे कोई चमचा है, जो अपना नाम आगे बढा़ए और न सपोर्ट करके उस स्वयंवर में भेजने वाला हैं। अब मुश्किल यह कि ‘भारत रत्न’ एक है और उसको चाहने वाले दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं। अपने-अपने क्षेत्र में तीर चलाने वाले एक दूसरे से अपने को बढ़ चढ़कर मान रहें हैं। अमां एक दिन वह था जब बड़े-बडे़ दिग्गज समाजसेवक और फांसी के फंदो को खुशी-खुशी अपने गले में डालने वाले कभी ख्वाब़ में ऐसा कुछ नहीं सोचते थे। ‘भारत रत्न’ की ही बात नहीं हैं बल्कि छोटे-मोटे इनाम इकराम से नवाजे जाने की चाहत रखने वाले भी एड़ी से चोटी तक का जोर लगा डालते हैं। उनसे ज्यादा मुंह से मुंह जोड़कर रहने वाले उनके इनाम पाने के लिए रायपुर से लेकर रायसीना रोड तक अपनी सारी ताकत झोंकने के लिए तैयार खड़े है। बस नहीं चल रहा हैं वरना पृथ्वीराज चौहान की तरह ‘भारत रत्न’ को जबरदस्ती अपनी गाड़ी में किडनैप करके भाग निकलते। भाई, जिसकी लाठी उसकी भैंस का जमाना है। कम से कम देश की सर्वोत्तम सुन्दरी ‘भारत रत्न’ की भी मर्जी का ख्याल करना चाहिए। क्या आजकल ऊंची कुर्सी पर बैठकर देशसेवा का नाटक करने वालों का मकसद यही होता है?
हमें तो बताया गया है कि निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वालों सें मुल्क खुश रहता है और उनके लिए सर्वोच्च सम्मान यही होता है कि लोग उन्हें याद करते हुए उनके अधूरे कार्यो को पूरा करें। य़ह तो वही हुआ कि बहती गंगा में जब जिसको मौका मिलता, हाथ धो ले। मेरे ख्याल से वही हाथ धोने के लिए इतिहास में पहली बार इतनी मारामारी हो रही है। जम्हूरियत का जमाना है किसको कौन रोक सकता है? मुझे तो शक हो रहा है कि कही लोग यह न कह बैठें कि वोट पड़ना चाहिए। लोकतंत्र में जनता के बहुमत की सब कद्र करते हैं। यह बहुमत कैसे किस तरकीब से आता है, सब जानते हैं। मेरा अपना ख्याल है कि इन सारे इनामों को कुछ दिनों के लिए मुलतवी कर देना ही बेहतर होगा। न रहे बांस न बजे बांसुरी। इनाम देकर खरीददारी का यह बाजार बंद होना चाहिए क्योंकि आगे चलकर कितनों को अपने गोल्ड मेडल कबाड़ी के हाथों बेचते हुए देखा है। बड़े सम्मान से नवाजे गए उस्ताद बिसमिल्लाह खान के आखरी वक्त को सबने खूब देखा है। इसी प्रकार न जाने ऐसे कितने देश के सपूत हैं जिनको कोई सम्मान नहीं मिला लेकिन वे सम्मानों से ऊपर हैं। इसी प्रकार वे लोग भी सम्मान पा गए जो किसी भी तरह से उसके हकदार नहीं थे। हालांकि लोग सब समझते हैं। अच्छा ही हुआ जो इस बार किसी को भारत रत्न नहीं मिला लेकिन इतने भर से इस सम्मान के लिए भीड़ कम न होगी। अगले साल फिर दावेदार सामने आएंगे। ऐसा ही होता रहा तो इस सर्वोच्च सम्मान की गरिमा का क्या होगा? यह तो मुल्क के मुस्तकबिल के अलम्बरदार ही जाने। दिल करता है कि कोई दिल अजीज़ मिले तो उससे कह दूं कि यार मुझमें क्या कमी है।

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